Happy Diwali 2022 wishes/Shubh Deepavali

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असली राम के भक्तों के घर रोज़ happy दीपावली होती है।चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात श्री राम जी सीता जी सहित अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय राजा राम की वापसी पर समस्त अयोध्या को घी के दीयों (दीपोत्सव) की रोशनी से जगमगा दिया था। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों (happy deepavali) की रोशनी से जगमगा उठी थी। तब से आज तक भारतीय प्रतिवर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्षोउल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर अक्टूबर या नवंबर के महीने में पड़ता है
अयोध्या में केवल दो वर्ष ही दिपावली (दिवाली) व दशहरा मनाया गया था।सीता जी रावण की गिरफ्त में बारह वर्ष रहीं। कुल मिलाकर चौदह वर्ष का वनवास काटा। जब अयोध्या लौटे तो लोगों ने खुशी मनाई की राम जी सीता माता को रावण की कैद से छुड़ा कर ला रहे हैं। हर तरफ खुशी का माहौल था। लोगों ने अयोध्या को घी के दीयों की रोशनी से प्रकाशमान कर दिया था। परंतु किसी भी प्रकार के बंब, पटाखे अयोध्यावासियों ने नहीं फोडे़ थे। न ही एक-दूसरे से मिठाई और तोहफों की अदला-बदली की। न ही किसी ने धनतेरस मनाया और न लक्ष्मी पूजन किया। न ही नए कपड़े खरीदे और पहने। न ही बाज़ारों में बंब पटाखों की, खेल-खिलौनों की खरीदारी और बिक्री हुई। तो फिर यह ग़लत परंपराएं कहां से और क्यों जुड़ती रहीं!

आइए त्रेतायुग में आए विष्णु अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जानें-वनवास के दौरान श्री सीता जी का अपहरण करके रावण ने सीता जी को नौ लखा बाग में कैद कर लिया था। भक्तमति मंदोदरी के बार-बार प्रार्थना करने से भी रावण ने सीता जी को वापिस छोड़ कर आना स्वीकार नहीं किया। तब भक्तमति मंदोदरी जी ने अपने गुरुदेव मुनिन्द्र जी से (कबीर परमेश्वर त्रेतायुग में ऋषि मुनिन्दर जी रूप में आए थे) कहा महाराज जी, मेरे पति ने किसी की औरत का अपहरण कर लिया है। वह उसे वापिस छोड़ कर आना किसी कीमत पर भी स्वीकार नहीं कर रहा है। आप दया करो मेरे प्रभु। आज तक जीवन में मैंने ऐसा दुःख नहीं देखा था। परमेश्वर मुनिन्दर जी ने कहा कि बेटी मंदोदरी यह औरत कोई साधारण स्त्री नहीं है। श्री विष्णु जी को शापवश पृथ्वी पर आना पड़ा है, वे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र रामचन्द्र नाम से जन्में हैं। इनको 14 वर्ष का वनवास प्राप्त हुआ है तथा लक्ष्मी जी स्वयं सीता रूप में विष्णु अवतार राम जी की पत्नी बन कर आईं हैं।
तमोगुण भगवान शिव की कठिन साधना करके, दस बार शीश न्यौछावर करके रावण ने यश और धन प्राप्त किया था। वह क्षणिक सुख भी रावण का चला गया तथा नरक का भागी हुआ। इसके विपरीत पूर्ण परमात्मा के सतनाम साधक विभीषण को बिना कठिन साधना किए पूर्ण प्रभु की सत्य साधना व कृपा से लंकादेश का राज्य भी प्राप्त हुआ। हजारों वर्षों तक विभीषण ने लंका के राज्य का सुख भोगा तथा प्रभु कृपा से राज्य में पूर्ण शान्ति रही। सभी राक्षस वृत्ति के व्यक्ति विनाश को प्राप्त हो चुके थे। भक्तमति मंदोदरी तथा भक्त विभीषण तथा परम भक्त चन्द्रविजय जी के परिवार के पूरे सोलह सदस्य तथा अन्य जिन्होंने पूर्ण परमेश्वर का उपदेश प्राप्त करके आजीवन मर्यादावत् सतभक्ति की वे सर्व साधक यहाँ पृथ्वी पर भी सुखी रहे तथा अन्त समय में परमेश्वर के विमान में बैठ कर सतलोक (शाश्वतम् स्थानम्) में चले गए

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सीता जी ने दी थी अग्नि परीक्षा


गीता जी में लिखित ज्ञान को भक्ति का आधार बनाइए

अर्जुन को काल ब्रह्म ने श्रीमदभगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में कहा है कि हे अर्जुन! जो व्यक्ति शास्त्रविधि को त्याग कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण (पूजा) करता है। वह न सिद्धि को प्राप्त होता है न परमगति को (गीता अ 16/ श्लोक 23) इस से तेरे लिए कर्तव्य अर्थात् करने योग्य भक्ति कर्म तथा अकर्त्तव्य अर्थात् न करनेेे योग्य जो त्यागने योग्य कर्म हैं उनकी व्यवस्था में शास्त्रों में लिखा उल्लेख ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि से नियत भक्ति कर्म अर्थात् साधना ही करने योग्य है। (गीता अ.16/ श्लोक 24) गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 व 20 से 23 तथा गीता अध्याय 9 श्लोक 20 से
23 तथा 25 में गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म ने तीनों देवताओं (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) की पूजा करना भी व्यर्थ कहा है, भूतों की पूजा, पितरों की पूजा व अन्य सर्व देवताओं की पूजा को भी अविधिपूर्वक (शास्त्रविधि विरूद्ध) बताया है।


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